Monday, July 27, 2009

राष्ट्रीय अस्मिता कवि डॉ हरिओम पंवार

भारतभर में विस्फोटों का शोर सुनाई देता है,
हिजबुल लश्कर के नारों का शोर सुनाई देता है,
मलय समीर मौसम आदमखोर दिखाई देता है
लालकिले का भाषण भी कमजोर दिखाई देता है,
इन कोहराम भरी रातों का ढालना बहुत ज़रूरी है
भोर तिमिर में शब्द ज्योति का जलना बहुत ज़रूरी है
नए युगों के कलमकार की कलम नहीं बिकने दूंगा
चाहे मेरा सर कट जाये कलम नहीं बिकने दूंगा
इसलिए केवल अंगार लिए फिरता हूँ मैं गीतों में
आंसू से भीगा अख़बार लिए फिरता हूँ मैं गीतों में,
ये जो आतंको पर चुप रह जाने की लाचारी है
ये हमारी कायरता है, अपराधिक गद्दारी है
ये शेरों का चरण पत्र है भेड़ सियारों के आगे
वाट वृक्षों का शीश नमन है खर पतवारों के आगे
जैसे कोई ताल तलय्या गंगा जमुना को डांटे
चार तमंचे मार रहे एटम के मुह पर चांटे
किसका खून नहीं खौलेगा पढ़ सुनकर अख़बारों में
शेरों की पेशी करवा दी चूहों के दरबारों में
इन सब षड्यंत्रों से पर्दा उठाना बहुत ज़रूरी है
पहले घर के गद्दारों का हटना बहुत ज़रूरी है
पांचाली के चिर हरण पर जो चुप पाए जाते हैं
इतिहास के पन्नो में वो सब कायर कहलाते हैं

Saturday, June 27, 2009

चाहा था एक फूल ने

दो चार बार हम जो कभी हम हँस-हँसा लिए
सारे जहान ने हाथ मे पत्थर उठा लिए

रहते हमारे पास तो यह टूटते ज़रूर
अच्छा किया जो आपने सारे सपने चुरा लिए

चाहा था एक फूल ने की साफ़ रहे राहें उसकी
हमने खुशी से कांटे अपने पांव मे चुभा लिए

जब हो सकी न बात तो हमने यही किया
अपनी ग़ज़ल के शेर कहीं गुनगुना लिए

अब भी किसी दराज़ मे मिल जायेंगे तुम्हे
वो ख़त जो तुम्हे दे न सके, लिख लिखा लिए

Friday, June 19, 2009

अकेला ख्वाब

अजनबी सी इस दुनिया मे अकेला एक ख्वाब हूँ
सवालो से खफा एक चोट सा जवाब हूँ
जो न समझ सके उनकी लिए 'कौन'
जो समझ गए उनके लिए किताब हूँ
आंखों से देखोगे तोः खुश पाओगे मुझको
दिल से देखोगे तोः दर्द का सैलाब हूँ

Saturday, May 23, 2009

अजनबी

मुझे याद हैं वो रास्ते जो लेट जाते थे ज़मीन पर जब हम चला करते थे

मुझे याद है वो पेड़जो अपनी छांवो फैलाते थे जब उनकी गोद में हम सोते थे

मुझे याद है वो पत्थर जिनकी खामोशी ने हमारा हर राज़ जाना है पर जुबां पे उनकी ताले थे

मुझे याद है वो समुंदर जिनकी लहरों ने खुशी खुशी हमारे आसूं अपना लिए थे जब हम रोये थे

मुझे याद है वो फूल जो अपनी खूबसूरती मेरे कहने पे तुम्हे दे गए थे

मुझे याद हो वो बादल जिनकी बारिश मे हमारे बुरे दिन बहे गए थे

मुझे याद हैवो हवा जो हर बार मुझ तक तुम्हारे पैगाम पहुचती थी

अब तुम नहीं हो तो

रास्ते

पेड़

पत्थर

समुंदर

फूल

बादल

हवा

सब अजनबी से लगते है

Wednesday, May 20, 2009

मेरी आंखों को दिन रात रुलाने वाले
तू भी तड़पे
मुझको हर वक्त सताने वाले

हर घड़ी तेरे लिए आँहें भरता है दिल
प्यार की शमा
मेरे दिल मे जलाने वाले

दिल की दुनिया मे बसी है तेरी सूरत
अपनी कसमे
अपने वादों को भुलाने वाले

बेवफा कहूँ तुझको या कहूँ तुझको जालिम
हर घड़ी
मेरी मुहब्बत को ठुकराने वाले

रब से दुआ है पूरे हो तेरे हर सपने
मेरी मुहब्बत
केहर एक ख्वाब को मिटाने वाले

जाए तोः जाए कहाँ दिलकश तुम बताओ
हो गए है दुश्मन
अब तोः हमारे चाहने वाले

Saturday, April 4, 2009

Raat aur Khawab

रात को जब मै सोया था
तो क्या मालूम था
खवाब की दहलीज़ पे तुम दस्तक दोगी....

तुम्हारे साथ गुज़रे वो लम्हे
हकीकत से लगते हैं
जो मैंने छुआ था तुम्हे
जो तुम मुस्कराई थी....

हमारे बीच की वो बातें
वो तुम्हारी सासों का छुना मुझे
सब हकीकत सा लगता है....

सुबह जब आँख खुली
तो दिल बेचैन हो गया....
एक बोझ सा कुछ तो था सीने पे....
जो न उतारते बनता था
और न रखते ही बनता था....

खवाब टूट चुका था....
तुम नहीं थी....
वो साथ नहीं था....
फिर वहीँ दूरियां.....वही फासले....

एक ही ख्याल दिल मे आता था..
की काश वो रात कभी खत्म न होती....
पर कुछ सोच कर तसल्ली कर लेते हैं....
ख्वाब ही सही..............कुछ पल का साथ तो था....

New Creation for Old Story

तितलियों को पकड़ना उस की आदत थी
हर एक से लड़ना उस की आदत थी

वो जिसको तन्हाई से डर लगता था
मगर तन्हाई में रहना उस की आदत थी

वो मेरे हर झूठ से खुश होता
जिसे हमेशा सच बोलने की आदत थी

वो एक आंसू भी गिरने पर खफ़ा होता था
जिसे तन्हाई में रोने की आदत थी

वो कहता था कि मुझे भूल जाएगा
जिसे मेरी हर बात याद रखने की आदत थी

हमेशा माफ़ी मांगने के डर लगता था
पर गलतियाँ करना उस की आदत थी

वो जो दिल ओ जान निछावर करता था मुझ पे
मगर छोटी सी बात पे रूठना उस की आदत थी

हम उस के साथ चल दिए यह जानते हुए भी
राह में हर एक को छोड़ देना उस की आदत थी।